Tuesday, September 21, 2010

Zeher

दिन का चढ़ना और रात का ना ख़तम होना ज़हर लगता है

आती जाती साँसों का सिलसिला ज़हर लगता है

नींद से पहले तेरी याद आना ज़हर लगता है और उस याद का दर्द ज़हर लगता है

सवेरे उसी दर्द का एहसास ज़हर लगता है

तेरी जूस्तजू, तेरा घम ज़हर लगता है.......

ज़िंदगी की पायदारी ज़हर लगती है

इस दर्द की शिद्दत भी ज़हर लगती है

तू पास नहीं है आज मेरे

तेरी नफ़रत, यह ज़ॉक-ए-ख्वारी ज़हर लगती है

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