Wednesday, July 6, 2011

एक सूना सा मकान

एक हारी हुई बाज़ी
एक थका सा इंसान
रोशनी से बहुत दूर
एक सूना सा मकान


एक पुराना सा मंदिर

एक भूली हुई बात
पैरों की आहट में
पायल की झंकार


एक चाँद का टुकड़ा

एक सूरज का ताप
बादलों की ठंडक में
पहली मौसम की बरसात


एक बुढ़िया की झोपड़ी

एक बिस्कुट की दुकान
सूखी पत्तियों से बनी
पेड़ पर वो मचान


एक आँगन में तुलसी

एक तुलसी पर दीया
चूल्‍हे के कोयले से
आँखों में धुआँ



एक नदी की हलचल

एक मुसाफिर की पदचाप
एक ऋतु का अंदेशा
एक चहरा गुमनाम


एक उदास सा चहरा

एक थका सा इंसान
रोशनी से बहुत दूर
वो सूना सा
मकान

Tuesday, May 10, 2011

Aaj.

आज बहुत पुरानी किताब के पन्नो से
तुम्हारा दिया हुआ वो फ़ूल मिला
कॉलेज के दिनो का दिया हुआ
वो फ़ूल आज भी
उस ज़िंदगी की याद दिलाता है
जब रोज़ सुबह जल्दी से तैयार होकर
मैं साइकल पर कॉलेज जाती थी
तुम अपने घर से पैदल आते थे
कभी तुम पहले पहुँचते थे
और कभी मैं
हम दोनो एक साथ ही
क्लास में जाते थे
जिस दिन तुम नहीं आते थे
मैं भी घर वापिस
चली जाती थी
वो दिन मुझे आज भी याद है
जब तुम दूर बॉमबे में
काम करने के लिए जा रहे थे
उस दिन
तुमने मुझे आख़िरी बार
एक फ़ूल दिया था
वो फ़ूल आज मुझे
बहुत पुरानी किताब के पन्नो में से मिला है

तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


आज तुम्हारी सालगिरह है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हें याद कर-कर के
खुद सोती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सोने से पहले
आखरी ख़याल तुम्हारा होता है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सुबह की पहली किरण से पहले
तुम्हारी याद मेरे सीने में उतरती है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारा नाम कोरे काग़ज़ पे
लिखती और पढ़ती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारी तस्वीर को सीने से
लगाए घूमती-फिरती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

 तुम्हारे ज़िक्र की प्यासी
दीदार की दीवानी
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


अब तो यह दिल भी नहीं रहा मेरा
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


वो रब से जो एक आख़िरी दुआ मिलेगी
उस में भी तुम्हारा ही नाम होगा
तुम्हें और ...आज क्या दूं तोहफे में?

Saturday, May 7, 2011

मेरे जैसा...


कहीं तो होगा वो

इस भीड़ से परे

इस वीराने से दूर



इस लंबी सड़क के कोने पर

जहाँ पर यह टूटी पगडंडी

एक दम ख़तम हो जाती है

बिजली के खंबे के नीचे खड़ा

अभी भी

दाहिने पावं के नाख़ून से

धूल में गोल चक्कर बनाता होगा



शायद अब तक उसने

खाना ना खाया होगा

समय की उसको

कोई सूझ-बूझ नहीं

मच्छर और मक्खियों से भी

वो चिढ़ता नहीं

वो बस चुप चाप

अकेला, निराश

मेरी राह देखता है

मुझसे मिलने की कोशिश

कभी नहीं छोढ़ता वो

एक यह ही उसकी बात

बहुत पसंद है मुझे


मुझसे क्यूँ मिलना चाहता है वो?

आज तक जिससे मिलने को

कोई नहीं आया

उससे वो क्यूँ मिलना चाहता है?

क्या वो भी मेरे जैसा है?

अकेला, उदास...?

Friday, March 18, 2011

ज़िंदगी खूबसूरत है.....


हर एक चहरा सुंदर सी कहानी सुनाता है

वो छोटी सी मुस्कुराहट

वो पलकों का झपकना

वो होंठों के कोनों पे

एक हल्की सी शरारत

वो आँखों में

एक अजीब सी चमक

साँसों में भी

ज़िंदगी की महक

सीने के उतार- चढ़ाव में

जीने की उमंग

भौहों में

इंसान होनें का गर्व

माथे पर

अपनी खुद की पहचान

हर एक चहरा सुंदर सी कहानी सुनाता है


कभी तुमने उन आँखों में


झाँक कर देखा है?


कभी उन साँसों की रफ़्तार से

कुछ सीख ली है?


कभी उन भौहों को देखो


क्या तुम उतने गर्व से कह सकते हो

की हाँ

ज़िंदगी खूबसूरत है.....

Monday, February 14, 2011

Zindagi ki raftaar


ज़िंदगी की रफ़्तार बहुत तेज़ हो चली है


उन सूखी हुई पत्तियों की आवाज़ नहीं सुनाई पडती अब  
जो हवा के ज़ोर से इधर-उधर फिरती थीं


जब बारिश की बूँदें बेज़ार धरती पर गिरती हैं
उन बूंदों की टिप-टिप भी धीमी पड़ गयी है


हल्के से जो पर्दे हवा से सरसराते थे
वो खामोशी की तह में सिमट गये हैं


कानों में तुम्हारा चुपके से कुछ कह देना
अब सुनाई नहीं देता


इन साँसों का उतार-चढ़ाव भी अब
अंजाना सा लगता है


ज़िंदगी की रफ़्तार बहुत तेज़ हो चली है

Saturday, January 15, 2011

कारवाँ

आज वो रुका-रुका सा कारवाँ फिर चल पड़ा है...

आज एक खुशनुमा सी हवा चली है
जब बारिश की चंद बूँदों ने
मेरे रोम-रोम को भिगो सा दिया है
आज ज़िंदगी फिर जी उठी है
जब तेरी आवाज़ ने आगे बढ़ कर 
उन सोई चाहतों को जगा दिया है
आज आँखों में वो चमक फिर आ गयी है
जो आँसुओं की वज़ह से छिप गयी थी
जो शब्द पहले कोरे हो चले थे
आज फिर अपने आप तरो ताज़ा हो गये हैं

 आज वो रुका-रुका सा कारवाँ फिर चल पड़ा है...