ज़िंदगी की रफ़्तार बहुत तेज़ हो चली है
उन सूखी हुई पत्तियों की आवाज़ नहीं सुनाई पडती अब
जो हवा के ज़ोर से इधर-उधर फिरती थीं
जब बारिश की बूँदें बेज़ार धरती पर गिरती हैं
उन बूंदों की टिप-टिप भी धीमी पड़ गयी है
हल्के से जो पर्दे हवा से सरसराते थे
वो खामोशी की तह में सिमट गये हैं
कानों में तुम्हारा चुपके से कुछ कह देना
अब सुनाई नहीं देता
इन साँसों का उतार-चढ़ाव भी अब
अंजाना सा लगता है
ज़िंदगी की रफ़्तार बहुत तेज़ हो चली है
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