Tuesday, May 10, 2011

तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


आज तुम्हारी सालगिरह है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हें याद कर-कर के
खुद सोती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सोने से पहले
आखरी ख़याल तुम्हारा होता है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सुबह की पहली किरण से पहले
तुम्हारी याद मेरे सीने में उतरती है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारा नाम कोरे काग़ज़ पे
लिखती और पढ़ती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारी तस्वीर को सीने से
लगाए घूमती-फिरती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

 तुम्हारे ज़िक्र की प्यासी
दीदार की दीवानी
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


अब तो यह दिल भी नहीं रहा मेरा
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


वो रब से जो एक आख़िरी दुआ मिलेगी
उस में भी तुम्हारा ही नाम होगा
तुम्हें और ...आज क्या दूं तोहफे में?

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