Saturday, May 7, 2011

मेरे जैसा...


कहीं तो होगा वो

इस भीड़ से परे

इस वीराने से दूर



इस लंबी सड़क के कोने पर

जहाँ पर यह टूटी पगडंडी

एक दम ख़तम हो जाती है

बिजली के खंबे के नीचे खड़ा

अभी भी

दाहिने पावं के नाख़ून से

धूल में गोल चक्कर बनाता होगा



शायद अब तक उसने

खाना ना खाया होगा

समय की उसको

कोई सूझ-बूझ नहीं

मच्छर और मक्खियों से भी

वो चिढ़ता नहीं

वो बस चुप चाप

अकेला, निराश

मेरी राह देखता है

मुझसे मिलने की कोशिश

कभी नहीं छोढ़ता वो

एक यह ही उसकी बात

बहुत पसंद है मुझे


मुझसे क्यूँ मिलना चाहता है वो?

आज तक जिससे मिलने को

कोई नहीं आया

उससे वो क्यूँ मिलना चाहता है?

क्या वो भी मेरे जैसा है?

अकेला, उदास...?

No comments:

Post a Comment