धरती पर भार
बहुत बढ़ गया
है
इंसान की मुसीबतों
का भार
ज़िंदगी की कढ़वाहट
का भार
सीने की जलन
का भार
दिन- रात की
बैचेनी का भार
धरती पर भार
बहुत बढ़ गया
है
छोटे से बड़े,
हर ग़म का
भार
हर इक आँसू,
हर इक आह
का भार
रोज़ खाई हुई,
उस ठोकर का
भार
रोज़ मिली हुई,
उस ज़िल्लत का
भार
धरती पर भार
बहुत बढ़ गया
है
आँखों में सूखे हुए
आँसुओं का भार
भूखे पेट की जलन का
भार
नंगे बदन की शर्म का भार
फुटपाथ पे ठिठुरती
रातों का भार
धरती पर भार
बहुत बढ़ गया
है
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