शाम
शाम के खाली हाथों में
कुछ उदासी के पल हैं
जो धीमी-धीमी धधकनों से
कुछ कहना चाहते हैं
रात के सन्नाटे में
बहुत से यादें हैं
जो परच्छाईओं को झंझोड़ के
खुद से बिछड़ना चाहती हैं
सुबह के दामन में
वो किरण नहीं है
जो दिन के उजियारे का
संदेशा लाती है
दोपहर के वीरने में
कुछ बिखरे हुए पल हैं
जो तुम्हारा साथ पाने को
आज भी सिसकते हैं
शाम के खाली हाथों में
कुछ उदासी के पल हैं
जो धीमी-धीमी धधकनों से
कुछ कहना चाहते हैं
रात के सन्नाटे में
बहुत से यादें हैं
जो परच्छाईओं को झंझोड़ के
खुद से बिछड़ना चाहती हैं
सुबह के दामन में
वो किरण नहीं है
जो दिन के उजियारे का
संदेशा लाती है
दोपहर के वीरने में
कुछ बिखरे हुए पल हैं
जो तुम्हारा साथ पाने को
आज भी सिसकते हैं
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