Tuesday, May 10, 2011

Aaj.

आज बहुत पुरानी किताब के पन्नो से
तुम्हारा दिया हुआ वो फ़ूल मिला
कॉलेज के दिनो का दिया हुआ
वो फ़ूल आज भी
उस ज़िंदगी की याद दिलाता है
जब रोज़ सुबह जल्दी से तैयार होकर
मैं साइकल पर कॉलेज जाती थी
तुम अपने घर से पैदल आते थे
कभी तुम पहले पहुँचते थे
और कभी मैं
हम दोनो एक साथ ही
क्लास में जाते थे
जिस दिन तुम नहीं आते थे
मैं भी घर वापिस
चली जाती थी
वो दिन मुझे आज भी याद है
जब तुम दूर बॉमबे में
काम करने के लिए जा रहे थे
उस दिन
तुमने मुझे आख़िरी बार
एक फ़ूल दिया था
वो फ़ूल आज मुझे
बहुत पुरानी किताब के पन्नो में से मिला है

तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


आज तुम्हारी सालगिरह है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हें याद कर-कर के
खुद सोती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सोने से पहले
आखरी ख़याल तुम्हारा होता है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सुबह की पहली किरण से पहले
तुम्हारी याद मेरे सीने में उतरती है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारा नाम कोरे काग़ज़ पे
लिखती और पढ़ती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारी तस्वीर को सीने से
लगाए घूमती-फिरती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

 तुम्हारे ज़िक्र की प्यासी
दीदार की दीवानी
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


अब तो यह दिल भी नहीं रहा मेरा
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


वो रब से जो एक आख़िरी दुआ मिलेगी
उस में भी तुम्हारा ही नाम होगा
तुम्हें और ...आज क्या दूं तोहफे में?

Saturday, May 7, 2011

मेरे जैसा...


कहीं तो होगा वो

इस भीड़ से परे

इस वीराने से दूर



इस लंबी सड़क के कोने पर

जहाँ पर यह टूटी पगडंडी

एक दम ख़तम हो जाती है

बिजली के खंबे के नीचे खड़ा

अभी भी

दाहिने पावं के नाख़ून से

धूल में गोल चक्कर बनाता होगा



शायद अब तक उसने

खाना ना खाया होगा

समय की उसको

कोई सूझ-बूझ नहीं

मच्छर और मक्खियों से भी

वो चिढ़ता नहीं

वो बस चुप चाप

अकेला, निराश

मेरी राह देखता है

मुझसे मिलने की कोशिश

कभी नहीं छोढ़ता वो

एक यह ही उसकी बात

बहुत पसंद है मुझे


मुझसे क्यूँ मिलना चाहता है वो?

आज तक जिससे मिलने को

कोई नहीं आया

उससे वो क्यूँ मिलना चाहता है?

क्या वो भी मेरे जैसा है?

अकेला, उदास...?