Tuesday, April 28, 2015

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है






धरती पर भार बहुत बढ़ गया है

इंसान की मुसीबतों का भार
ज़िंदगी की कढ़वाहट का भार
सीने की जलन का भार
दिन- रात की बैचेनी का भार

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है

छोटे से बड़े, हर ग़म का भार
हर इक आँसू, हर इक आह का भार
रोज़ खाई हुई, उस ठोकर का भार
रोज़ मिली हुई, उस ज़िल्लत का भार

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है

आँखों में सूखे हुए आँसुओं का भार
भूखे पेट की जलन का भार
नंगे बदन की शर्म का भार                  
फुटपाथ पे ठिठुरती रातों का भार

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है